Saturday, 18 March 2017

सभै सुनाई होरी मे

हिन्दी हिन्दी उहो क़हत हौ
हिन्दी गाईं होरी मे ।
रटल रटावल घीसल पीटल
सभै सुनाई होरी मे ॥

पढ़ल उरुवा अनपढ़ मंत्री
इहो बताईं होरी मे ।  
लिख लोढ़ा पढ़ पाथर के हौ
भेंट कराईं होरी मे ॥

अंडे क फंडा सभ देखल
उहो नचाई होरी मे ।
इटली वाली पंचर सइकिल
कहाँ चलाईं होरी मे ॥ 

गूंगवा बोलल ढेर दिनन मे
फूल चढ़ाईं होरी मे ।
भरल तिजोरी देंवका चाटी
पचरा गाईं होरी मे ॥

उड़नखटोला फाटल कुरता
बात बनाई होरी मे ।
नेताजी के नव लखिया मे
तेल भराईं होरी मे ॥ 

मंदिर मंदिर माथा टेकस
पास कराईं होरी मे ।
ई वी एम मे सभ नीमन होखो  
लाज बचाईं होरी मे ॥
भांग घोंट के मातल काशी
ठेंग देखाई होरी मे ।
डराई डे बा थैली से ही
काम चलाईं होरी मे ॥

साँझ अवध के सुबहे बनारस
फेर बताईं होरी मे ।
खुने खून नवाबी नगरी
तहजीब सिखाईं होरी मे ॥

धरम जाति के फइलल जहर
उहो मेटाईं होरी मे ।
सभ केहु इहवाँ आपन बाटे
गरे लगाईं होरी मे ॥  



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Saturday, 22 October 2016

सूत्रधार कौन ?

बिना बात मन के तार
बज उठे थे
असमय कोई सूत्रधार
मधुर धुन छेड़ गया था
उसकी इतनी स्निग्ध तान
जीने लगा न चाहकर भी
जल उठी अचानक एक लौ
गुनगुनाना भूलकर वो
ढूँढता फिर रहा है
अंधेरे मे ।

रोशनी अब फैलने लगी है
मंथर गति से
साधना इतनी सुहानी
अब मिली क्यों
मुग्ध चितवन आज
स्वयं पर
एक नया बचपन
जी रहा हूँ ।

मन भावुक हो चला है
आंखे बरसात को आतुर
अचानक मौसम मे परिवर्तन
आत्म अंश का बोध
कितनी अनोखी सोच
कब मिला , कब अपना हुआ वह
सोचता हूँ
हर रोज
बिना किसी अंतराल के   
आखिर वह सूत्रधार कौन ?


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Saturday, 1 October 2016

गांधी तेरे देश में

बड़े बड़े घड़ियाल पड़े हैं
धन से मालामाल बड़े है
लूट रहे हैं रोज देश को
नित्य नए गणवेश में || गाँधी तेरे ......

चोरी या पाकिटमारी है  
घोटालों की बीमारी है
बात बात में पैसा चाहिए
सरकारी निवेश में || गाँधी तेरे ...

कोई आता धमका जाता
नेताओं को दिल्ली भाता
निंदा फिर कड़ी ही करते
संसद वाले केस में || गाँधी तेरे ......

राहजनी और हिंसा होती
कड़वाहट के बिरवा बोती
ऊँच नीच भी छुआ छूत भी
धर्म जाति के रेस में || गांधी तेरे ......

भाषण और भड़ैती होती
दिन में रोज डकैती होती
इज्जत की ही बोली लगती
दिल्ली के परिवेश में || गांधी तेरे ......

हिन्दू मुस्लिम बात पुरानी  
पीकर घाट घाट का पानी
नियम बनाते सांसद आकर  
बापू तेरे भेष में || गाँधी तेरे ........



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Friday, 19 August 2016

कब्रिस्तान के बगल वाली लड़की

कब्रिस्तान के बगल वाली लड़की
चुलबुली सी
प्यारी सी
खनकती हँसी के संग
इधर - उधर
तितलियों सी मंडराती
सबको हंसाती , हंसती
किलोलें भरती हंसिनी सी .

वहां उसका होना
रोज एक नयी  कहानी
की भूमिका गढ़ जाता है
दे जाता है कथानक
किसी उपन्यासकार को
भावभूमि किसी कवि को.

वो लड़की किसी दिन
जब होती है उदास
रुक जाता पत्तियों का
हिलना – डुलना
पक्षियों का कलरव
लहरों का तरंगायन
पास वाले तालाब में भी .

कभी जब ओ लड़की रोती
सुबह सारी पगडंडी
भींगी भींगी मिलती
कब्रिस्तान में मिलता
गहराया  सन्नाटा
अनचाहा , अनायास

सभी मानते थे उसको अपना
वो भी ऐसे लगता था
कि किसी की बेटी है
किसी  की बहन है
और किसी की प्रेयसी
प्यार और मनुहार
उसके गहने जो हैं .

जब बहुत दिनों से
दिखी नहीं वह
कब्रिस्तान के बगल वाली लड़की
माथे पर सिलवटें
आ गयीं
आँखे भींग गयी
अपनों की भी
उसके अपनों की भी
बड़ी प्यारी थी जो .



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Sunday, 7 August 2016

हे ! नाग देवता पालागी !




हे ! नाग देवता पालागी !
--------------------------------

आस्तीन में पलिहा  बढ़िहs   
मनही मन परिभाषा गढ़िहs    
कुछो जमइहा कबों उखरिहा 
गारी  सीकमभर  उचारिहs  
हे ! नाग देवता पालागी !

हरदम  तोसे नेह  देवता
बसिहा  एही  गेह  देवता
नीको नेवर बुझिया भलहीं
डसिहा  एही  देह  देवता
       हे ! नाग देवता पालागी !

केकर मितई  कइसे जानब
दुसमन के कइसे पहिचानब   
बिजुरी  के  छूवब जे कबहूँ
तोसे बेसी  फन हम तानब
       हे ! नाग देवता पालागी !

छोछर कुल अभिमान देवता
हेराइल   सनमान   देवता
अकडू से  उकडूं  तू भइलs
अइसन तू  भगमान  देवता  
       हे ! नाग देवता पालागी !



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

आन्हर घुमची

आन्हर घुमची
--------------------
घेंटा मिमोरत
तोड़त - जोड़त
आपन –आपन गावन
अपने अभिनन्दन
समझवनी के बेसुरा सुर
बिना साज के
संगीत साधना .

झाड़ झंखाड़ से भरल
उबड़ खाबड़ बंजर जमीन
ओकर करेजा फारत
फेरु निकसत
कटइली झाड़
लरछे-लरछे लटकल पाकल
लाल टहक घुमची
अपने गुमाने आन्हर
दगहिल घुमची .

देखलो पर
अनदेखी करत
अनासे शान बघारत
बरियारी आँख देखावत
अनेरे तिकवत
बिखियायिल मुसुकी मारत
औंधे मुँह
धूरी में सउनाइल धुमची


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  


Thursday, 5 May 2016

अब्बो ले सुपवा बोलेला


ताल तलहटी, गाँव के रहटी
कब फूटल किस्मत खोलेला
अब्बो ले सुपवा बोलेला |

दिन में खैनी साँझ के हुक्का
भोरहीं आइल साह के रुक्का
खेती में ना भयल कुछहु
अन्दाता फुक्के का फुक्का 
बिगरल माथा डोलेला | अब्बो ले सुपवा बोलेला |

बाढ़ बहवलस गाँवे  गाँव
पहरी पर अब बनल ठांव
मदत लीहने शहरी  बाबू
अब कइसे मोर पड़ी पाँव 
फंसरी में , मुड़ी तोलेला | अब्बो ले सुपवा बोलेला |

नन्हकी आपन भइल सयान
कब ले राखब ओकर ध्यान  
धावत धुपत घिसल  पनही
बेटहा  के बा  ढेर  पयान
हिम्मत के थुन्ही डोलेला | अब्बो ले सुपवा बोलेला |

बंसखट भइल दुअरे सपना
बइठे वाला ना केहू अपना
नेह छोह के किस्मत फूटल
उधार पइंच भइल कलपना
मन , भर गगरी विष घोलेला | अब्बो ले सुपवा बोलेला |

हम बानी लइकी के बाप
सोचत छाती लोटत सांप
कइसे लागी हाँथे हरदी
सोचत बेरी गइली काँप
बिन बेटी घर ना सोहेला | अब्बो ले सुपवा बोलेला |



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी