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Saturday, 27 February 2016

फिर नव दीप जलाएंगे


नासमझी के आंदोलन से
फैला जो कटुता का मंजर ।
समता की भाषा कुंद हुई
मड़राता हाथ लिए खंजर ॥
त्रासित मन के घर आँगन को , खुसियों से चहकाएंगे ॥
                           फिर नव दीप जलाएंगे  ॥

हर गहरी खाईं भरना है 
पुष्पित मुक्त कंठ करना है ।
उभरी हुई अराजकता को
जड़ समेत विस्मृत करना है ॥
सृजित जन मन के प्रांगण को , खुसियों से महकाएंगे ॥
                       फिर नव दीप जलाएंगे  ॥

शिक्षा का आँगन स्वच्छ करें
जन जन क्षमता से दक्ष करे
फैल रही विष बेल यहाँ जो
समरसता से निरस्त करें ॥
जीवन के हर जड़ जंगम को , दीक्षा से चहकाएंगे ॥
                   फिर नव दीप जलाएंगे  ॥

प्रदूषित यह जो आरक्षण है
सचमुच क्षमता का भक्षण है
अनवरत प्रगति की राहों मे
सब विद्रुपता का संरक्षण है ॥
स्वस्थ्य स्पर्धा करने को , हर  पथ दमकाएंगे ॥
                  फिर नव दीप जलाएंगे





·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Tuesday, 23 February 2016

भावहीन मन


मन का स्पंदन
भयहीन
प्रफुल्लित तरु
उर आह्यलादित
भ्रमित नहीं कुछ ।

खुद ही ब्याख्यायित
अपनी भाषा
अपनी शैली
स्तरहीन नहीं
किसी नजर मे ।

सबसे अलग
अद्भुत पहचान
अपना सा भान
मान सम्मान
अनुवादित खुद से ।

देखना ही
अब शेष बचा है
अंतरमन को
अंतरमन से
कहाँ बसा एकांत ।

परिस्थितियों से परे
परिचालित परम्पराएँ
उद्वेलित कर गयीं
वह हर पल
जिसे अपना न सका ।
  
स्पंदन अब
लगता क्रंदन सा
जो था कभी
वंदन सा
अभिनंदन सा ।

भावहीन मन
घुटन से लथपथ
मृत्यु की बाट जोहता
क्रिसित बीमार सा
अधमरा ॥



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

भलाई न देखी

भले आदमी की भलाई न देखी
कभी जानकर वो कलाई न देखी ।  
खुले आम मुझको गलत बोलते हैं
कभी जिनकी मैंने लुगाई न देखी ।

आरोपी बना जिस खजाने का हूँ मै
उसकी अभी तक चिनाई न देखी ।
अकेला था मिलने नहीं कोई आया
जमाने की ऐसी रुसवाई न देखी ।

कांटे ही मिले मुझको हर डगर मे
कहीं भी गमो की दवाई न देखी  ।
निपटता भला कैसे उन जालिमो से
जिन आखों मे दया की छाईं न देखी ।

बहुत ही निपुण हैं अपनी कला मे
उन हाथो के जैसी सफाई न देखी ।
जकड़ा गया जिस भी पाश मे मै
उससे किसी की रिहाई न देखी ॥


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Thursday, 28 January 2016

जियारत सरीखे

कहने की हिम्मत भी सुनने का जज्बा ।
सहा जिल्लतों को शरारत सरीखे ॥
ना देखा बुरा ना  की कोई कवायद ।
सहे हर सितम को तिजारत सरीखे ॥
न कोई गिला इस जमाने से हमको ।
जी ही लूँगा इसको नसाफत सरीखे ॥
मधुर कुछ नहीं ,सब तीखे ही तीखे । 
जिया गुरबतों को, जियारत सरीखे ॥



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी