Monday, 2 November 2015

भकुयाइल बबुआ

माटी के थाती छोड़ी जब से पराइल बा ।
नीमन बबुआ तभिए से भकुयाइल बा ॥

जिनगी के अहार न विचार परसार
टुटल घर आ दुआर बहत दुखे के बेयार ।

सोगहग नहीं कुछों कूल्हिए पिसाइल बा ॥ नीमन बबुआ.....

हसी ठठा गइल भूल , शूल हियरा मझार
मिटल जाता समूल नाही लउकत उजियार

तन मन धन तीनों कब से छितिराइल बा ॥ नीमन बबुआ....

गाल बस बजावत एनी ओनी समुझावत
थपरी के साथ मे डफलियों न पावत

गीत आ संगीत बिनु गवैयों खिसियाइल बा ॥ नीमन बबुआ......

लिखी बोली आपन भाषा  इहे सबही के आशा
मिली जुली सगरी जाने आवा एकरो के तराशा

रउवा नेह बिनु भोजपुरी पिछूयाइल बा ॥ नीमन बबुआ....




·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

लुगरी से मरजाद ढकाइल

अनकस लागे लगल रिवाज
करकस बाजन बिगड़ल साज
पटवन मे जमीन धराइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

खड़हर दुवारा टूटल खटिया
कोरउरो चाउर नहीं मयस्सर
बीपत भइल भूख मिटाइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

भकठल चाउर चिंगुरल मनई
दाल भइल पंछोंछर बा
धसल गाल हड़री छितिराइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

ढेर गाँवन के बा ई हाल
बच्चा बच्चा भइल बेहाल
साक्षारता के बात भुलाइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

कूल्ही चरित्तर महगी लिहलस
चकमक लवकत बकुली धईलस
नीक दिनन के बाट जोहाइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

  

·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Saturday, 24 October 2015

: बस कोलाहल को जीता हूँ :

अधर्म धर्म धरती का जीवन
अति उमंग से सज्जित उपवन ।
ध्वनि कुटिलता लिए पल्लवित
सहज भेदती मानव मन ।

घर बाहर मंदिर मस्जिद
हर जगह हलाहल पीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

राजनीति का सतही पाठन
कांटो के आलिंगन मे है ।
रक्त पिपाशु के आंखो सा
मानवता के क्रंदन मे है ।

भूत भविष्य या वर्तमान की
स्मृतियों से रीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

भटक चुकी है नियत राह से
समरसता की परछाईं भी ।
लासों के ढेर गिरे इतने
उथली हो गयी खाईं भी ।

गाँव गली के हर नुक्कड़ का
गुरुवाणी , कुरान या गीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

एहसास नहीं आभाष नहीं
विकृत अदाओं का मंजर है ।
गहरा स्वार्थ पहचान विखंडित
हर हाथ लिए एक खंजर है ।

करुणा ममता खंडित समता
भंडारण की परिणीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

आहार नहीं व्यवहार नहीं
दंश विरक्ति के सहता जाता ।
सरहद घर की चौखट बनती
मातमी ध्वनि मे कहता जाता ।

निर्मम निर्दय नियम नियंता
निनादों से निर्मिता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

दुल्हन मंडप शादी सेहरा
शुभकामनाओं का घोर अभाव ।
ढूढता फिर रहा नगर डगर
कहाँ बसी खुसियों की छाँव ।

किसी भी छड़ कटने को आतुर
एक उद्घाटन का फीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Sunday, 11 October 2015

: बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह :

आजु हमरा के नियरा बईठा के
बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह ।
दुनियाँ – समाज के रहन सभ  
हमरा के विस्तार मे बतउनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ....  

राजनीति के रहतब – करतब
एनी ओनी के ताक - झाँक
बोली ठिठोली के मतलबों आ
नीक – निहोरा क आईना देखवनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ....

लोक - परब के मर्यादा भी
बेमतलब के अक –बक मे
साँच झूठ आ सुभूमि कुभूमि
जीयला क मरमों बतउनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ...

घर दुअरा के सिकुड़न मे
रिस्ता निभवला के बिपत होला
हाड़ी पतरी औरो गाँव देहात मे
परसिद्ध मनईन के चरित्तर जनवनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ....

एगो अलगा पहचान के मंतर
समवेत स्वरन के अनंतर से
मिजाज के नेह छोह क उड़ान
मित्तर संहतिया के माने गुनवनी ह ॥
बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह ॥


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी   

Friday, 9 October 2015

: काशी घायल है :


कल कल बहती पतित पावनी
घाटों पर अविरल मंत्रोचार  ।
अल्हड़ता जिसके रग रग मे
फक्कड़पन का एकाधिकार ।
जहां आस्था का संचार , काशी घायल है ॥

अनबुझी अग्नि मणिकर्णिका की
उत्प्लावित गंगा जामुनी तहजीब ।
अर्चन - पूजन , घंटा - घड़ियाल
गुंजित अजान , विस्मृत अजीज ।
जहां बसते ‘शंकर’ सपरिवार , काशी घायल है ॥

लीलाओं का मंचन, स्फूर्त स्पंदन
मौत भी उत्सव सी यात्रा लाती  ।
आस्था पर यहाँ बर्बर तांडव
संतो बटुकों का रुदन,दरकती छाती ।
अनुचित इनका तिरस्कार , काशी घायल है ॥

चिड़ियों की चहक भी स्तंभित  
क्यों ट्वीटर खामोस पड़ गया ?
नही बुझ रही सुलगती चिंगारी
पी एम ओ पे ताला जड़ गया ?
थम नहीं पा रही चीख पुकार , काशी घायल है ॥

गुमसुदा हुई माँ गंगा की कसमें
बेटा क्यों  श्री  मुख छुपा रहा ।
कर्तव्यों की इति - श्री समझें ,
या स्वं की संस्कृति मिटा रहा ।
जहां बसता कबीर का प्यार , काशी घायल है ॥

प्रशासन संज्ञा शून्य हुआ क्यों ?
अमन चैन विक्षिन्न हुआ क्यों ?
अवमानना की अतिस्योक्ति मे
यह बर्बर लाठीचार्ज हुआ क्यों ?
संवेदनाहीन विद्वत संसार , काशी घायल है ॥

मत लाँघो मानवता की लकीर
कल फकीर थे, हो अब भी फकीर ।
नमन करो, आओ, लो आशीर्वाद
या झाँको अपना कलुषित जमीर ।
मूर्ति विसर्जन मात्र संस्कार , काशी घायल है ॥


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Tuesday, 15 September 2015

: जीवन की आपाधापी :


छूट गए वो प्यारे पल , जीवन की आपाधापी मे ।।

कौन था ,किसका था , कैसा था
कब था किसने – किसने जाना ।
मटियाला उजड़ा वियावान
जिसने भी जहां कहीं पहचाना ।

मिल नहीं पाया समुचित हल , जीवन की आपाधापी मे ।।  

हर बदलाव सुनहरा होगा
यह निर्णय हुआ कब था ।
नए पुरानो की सेल्फी का
यह चिर – मिलन हुआ कब था ।

नित प्रति बढ़ चली पहल , जीवन की आपाधापी मे ।।

हर जगह मची बस मार  धाड़
बह रही समस्याओं की बयार  ।
हर सच झूठा , झूठ है सच्चा
हुई शब्द संहिता तार  - तार ।

सूक्ष्म निरीक्षण को हर उज्वल , जीवन की आपाधापी मे ।।

जब दोषारोपण कण कण मे
कब दोष निकाला जाए ।
विषधर फैले हर घर मे
कब होश सम्हाला जाए ।

अनिर्णीत सबका अपना कल , जीवन की आपाधापी मे ।।

संरक्षित जीव – जन्तु होते हैं
या जाति व्यवस्था पता नहीं ।
जड़ जंगम का उद्गम स्थल
लोकतन्त्र की खता नहीं ।

कुनबे की बस क्षेम – टहल , जीवन की आपाधापी मे ।।

बिखर गया हर तिनका तिनका
जोड़ तोड़ की अंकगणित  सा ।
उत्थान - पतन की सुध ली किसने
रायसुमारी के क्रंदन  सा ।

अभिप्रेरित हो करते चल , जीवन की आपाधापी मे ।।

सब व्यस्त सुरक्षा छिन्न –भिन्न
नारी अभिरक्षा कब थी नवीन ।
सत्ता की सीमा पे जाकर
आचार संहिता कब रही कुलीन ।

अब गूगल की चिंता निर्मल , जीवन की आपाधापी मे ।।

छुई - मुई कब रही चेतना
पीड़ित शोषित की क्रसित वेदना ।
हर ज्ञाता ,  अनजान  बना
अनसुनी कर चरण बन्दना ।

सदमे मे भुला बिसरा कल, जीवन की आपाधापी मे ।
छूट गए वो प्यारे पल , जीवन की आपाधापी मे ।।



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Thursday, 10 September 2015

: अपनी भारतीय रेल :

सन्नाटे को चीरती , चिग्घाड़ती
निरापद सी , पटरियों को रौंदती
गंतव्य की ओर अग्रसरित
निरीह है , अपनी भारतीय रेल ।

अनगिनत उद्घोषों के तले
दबी कुचली सी , सभी से छली हुई
वैभव और विकास से कोसों  दूर
अपराधिनी है , अपनी भारतीय रेल ।

भ्रष्टाचार ग्रसित , कलुष अभिसिंचित
सुविधा विहीन , स्वच्छता से दूर
सुरक्षा के नाम के दिखावे पर जीवित
भयभीत है , अपनी भारतीय रेल ।

आम आदमी के नाम से आम आदमी से दूर
सुविधा भोगियों के लिए आरक्षित
कभी बिलखती ,कभी सकुचाती, कभी इतराती
कुंठित है , अपनी भारतीय रेल ।

यात्रियों को चिढ़ाते गंदगी से भरे पूरे स्टेशन
मुफ्तखोर कर्मचारियों से सजा विभाग
खुद पर आँसू बहाते , कल पुर्जों से सुसज्जित
लकवाग्रस्त है , अपनी भारतीय रेल ।

परिवर्तन की बाट जोहती , बूढ़ी , त्रासित
सिर्फ एक व्यवहार दूढ्ती, पूरी शापित
कौन बनेगा दीप , जलाए खुद का दीपक
आशान्वित है , अपनी भारतीय रेल ।


शिक्षा हो केवल सरकारी , सबकी करो मान्यता रद्द
योग्यता को केवल मिले , प्रश्रय यत्र - सर्वत्र
भ्रष्टाचार विहीन व्यव्स्था खोलेगी यह पथ
अभावमुक्त हो निखरेगी , अपनी भारतीय रेल ।



·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी