Wednesday, 4 November 2015

नींद खो गयी

सच ही उन तड़प की रातों मे
मेरी नींद खो गयी ।

जब से उन्हे देखा है
बस उनकी ही यादें हैं
तरुणाई के अलमस्त आलम मे मिलन
उनका यौवन और उनकी बातों मे
मेरी नींद खो गयी ।

कसमकस से भरी मुस्कुराहट
मेरी चाहत बन गयी है
थिरकनों से भरे चूँदर के बीच
चंचल चितवन और उनकी जज़्बातों मे
मेरी नींद खो गयी ।

फागुनी छेड़छाड़ से भरी हसरत
पवन को भी झकझोर गयी है
अरुणिम अधरों से टपकते मद पराग
दिल भ्रमर का गुंजन और उनसे मुलाकातों मे

मेरी नींद खो गयी ।

     ·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
 

Monday, 2 November 2015

अनुबंध

लिपट रहा हर रोज
विटप बल्लरी सा
समस्याओं की निधि से
यह मनुपुत्रों का जमघट
चाहकर भी , अनचाहे भी
अहर्निश ।

दफनाये जा रहे हैं
हर रोज
अपनत्व की थाती
लेखनी और तूलिका भी
स्निग्थ भावनाएं
अंधे की लकड़ी
और तो और
अछूता यौवन भी ।

बावला सा यह मनुपुत्र
फिर भी
शिकार बनकर संतुष्ट है
उन कलुषित चरित्रों का
आभारी भी है
शायद हर रोज
छला जाना ही
उसकी नियति बन गयी है
और
उसकी संतुष्टि का साधन भी ।
  
धर्म – अधर्म – राजनीति
रोटी सेकने की भट्ठी
कुर्सी की सीढ़ी
सस्ती लोकप्रियता का साधन
बनकर रह गया है
कराहती जनता का लहू
उनके लिए ।

आरक्षण
हमारे विकास हेतु
नहीं , कत्तई नहीं
वह तो हमसे अपने लिए
चाह रहे हैं
एक अनुबंध पर हस्ताक्षर
जिससे वे लूट सकें
खुलकर
सरेआम हमे ।


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

भकुयाइल बबुआ

माटी के थाती छोड़ी जब से पराइल बा ।
नीमन बबुआ तभिए से भकुयाइल बा ॥

जिनगी के अहार न विचार परसार
टुटल घर आ दुआर बहत दुखे के बेयार ।

सोगहग नहीं कुछों कूल्हिए पिसाइल बा ॥ नीमन बबुआ.....

हसी ठठा गइल भूल , शूल हियरा मझार
मिटल जाता समूल नाही लउकत उजियार

तन मन धन तीनों कब से छितिराइल बा ॥ नीमन बबुआ....

गाल बस बजावत एनी ओनी समुझावत
थपरी के साथ मे डफलियों न पावत

गीत आ संगीत बिनु गवैयों खिसियाइल बा ॥ नीमन बबुआ......

लिखी बोली आपन भाषा  इहे सबही के आशा
मिली जुली सगरी जाने आवा एकरो के तराशा

रउवा नेह बिनु भोजपुरी पिछूयाइल बा ॥ नीमन बबुआ....




·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

लुगरी से मरजाद ढकाइल

अनकस लागे लगल रिवाज
करकस बाजन बिगड़ल साज
पटवन मे जमीन धराइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

खड़हर दुवारा टूटल खटिया
कोरउरो चाउर नहीं मयस्सर
बीपत भइल भूख मिटाइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

भकठल चाउर चिंगुरल मनई
दाल भइल पंछोंछर बा
धसल गाल हड़री छितिराइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

ढेर गाँवन के बा ई हाल
बच्चा बच्चा भइल बेहाल
साक्षारता के बात भुलाइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

कूल्ही चरित्तर महगी लिहलस
चकमक लवकत बकुली धईलस
नीक दिनन के बाट जोहाइल
लुगरी से मरजाद ढकाइल ।

  

·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Saturday, 24 October 2015

: बस कोलाहल को जीता हूँ :

अधर्म धर्म धरती का जीवन
अति उमंग से सज्जित उपवन ।
ध्वनि कुटिलता लिए पल्लवित
सहज भेदती मानव मन ।

घर बाहर मंदिर मस्जिद
हर जगह हलाहल पीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

राजनीति का सतही पाठन
कांटो के आलिंगन मे है ।
रक्त पिपाशु के आंखो सा
मानवता के क्रंदन मे है ।

भूत भविष्य या वर्तमान की
स्मृतियों से रीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

भटक चुकी है नियत राह से
समरसता की परछाईं भी ।
लासों के ढेर गिरे इतने
उथली हो गयी खाईं भी ।

गाँव गली के हर नुक्कड़ का
गुरुवाणी , कुरान या गीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

एहसास नहीं आभाष नहीं
विकृत अदाओं का मंजर है ।
गहरा स्वार्थ पहचान विखंडित
हर हाथ लिए एक खंजर है ।

करुणा ममता खंडित समता
भंडारण की परिणीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

आहार नहीं व्यवहार नहीं
दंश विरक्ति के सहता जाता ।
सरहद घर की चौखट बनती
मातमी ध्वनि मे कहता जाता ।

निर्मम निर्दय नियम नियंता
निनादों से निर्मिता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।

दुल्हन मंडप शादी सेहरा
शुभकामनाओं का घोर अभाव ।
ढूढता फिर रहा नगर डगर
कहाँ बसी खुसियों की छाँव ।

किसी भी छड़ कटने को आतुर
एक उद्घाटन का फीता हूँ ।
बस कोलाहल को जीता हूँ ।


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 

Sunday, 11 October 2015

: बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह :

आजु हमरा के नियरा बईठा के
बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह ।
दुनियाँ – समाज के रहन सभ  
हमरा के विस्तार मे बतउनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ....  

राजनीति के रहतब – करतब
एनी ओनी के ताक - झाँक
बोली ठिठोली के मतलबों आ
नीक – निहोरा क आईना देखवनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ....

लोक - परब के मर्यादा भी
बेमतलब के अक –बक मे
साँच झूठ आ सुभूमि कुभूमि
जीयला क मरमों बतउनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ...

घर दुअरा के सिकुड़न मे
रिस्ता निभवला के बिपत होला
हाड़ी पतरी औरो गाँव देहात मे
परसिद्ध मनईन के चरित्तर जनवनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ....

एगो अलगा पहचान के मंतर
समवेत स्वरन के अनंतर से
मिजाज के नेह छोह क उड़ान
मित्तर संहतिया के माने गुनवनी ह ॥
बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह ॥


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी   

Friday, 9 October 2015

: काशी घायल है :


कल कल बहती पतित पावनी
घाटों पर अविरल मंत्रोचार  ।
अल्हड़ता जिसके रग रग मे
फक्कड़पन का एकाधिकार ।
जहां आस्था का संचार , काशी घायल है ॥

अनबुझी अग्नि मणिकर्णिका की
उत्प्लावित गंगा जामुनी तहजीब ।
अर्चन - पूजन , घंटा - घड़ियाल
गुंजित अजान , विस्मृत अजीज ।
जहां बसते ‘शंकर’ सपरिवार , काशी घायल है ॥

लीलाओं का मंचन, स्फूर्त स्पंदन
मौत भी उत्सव सी यात्रा लाती  ।
आस्था पर यहाँ बर्बर तांडव
संतो बटुकों का रुदन,दरकती छाती ।
अनुचित इनका तिरस्कार , काशी घायल है ॥

चिड़ियों की चहक भी स्तंभित  
क्यों ट्वीटर खामोस पड़ गया ?
नही बुझ रही सुलगती चिंगारी
पी एम ओ पे ताला जड़ गया ?
थम नहीं पा रही चीख पुकार , काशी घायल है ॥

गुमसुदा हुई माँ गंगा की कसमें
बेटा क्यों  श्री  मुख छुपा रहा ।
कर्तव्यों की इति - श्री समझें ,
या स्वं की संस्कृति मिटा रहा ।
जहां बसता कबीर का प्यार , काशी घायल है ॥

प्रशासन संज्ञा शून्य हुआ क्यों ?
अमन चैन विक्षिन्न हुआ क्यों ?
अवमानना की अतिस्योक्ति मे
यह बर्बर लाठीचार्ज हुआ क्यों ?
संवेदनाहीन विद्वत संसार , काशी घायल है ॥

मत लाँघो मानवता की लकीर
कल फकीर थे, हो अब भी फकीर ।
नमन करो, आओ, लो आशीर्वाद
या झाँको अपना कलुषित जमीर ।
मूर्ति विसर्जन मात्र संस्कार , काशी घायल है ॥


·         जयशंकर प्रसाद द्विवेदी